What is the difference between venture capitalists and angel investors

Last Updated: October 19, 2019By Tags:

आखिर क्या अंतर है Venture Capitalist और प्राइवेट एक्विविटी में व कैसे ये एक स्टार्टअप/बिजनेस को बढ़ाने में मदद करते है―आज स्टार्टअप का युग है बिजनेस का है। जहां एक समय भारत का युवा सरकारी नौकरी की ओर भाग रहा था आज ऐसा नही है।हालांकि युवाओं का रुझान सरकारी नौकरी की तरफ आज भी है परन्तु जिस तरह से zometo,saifi,Oyo,byju जैसी कम्पनियो ने हाल ही मवे सफलता पाई है और गूगल,फेसबुक,याहू पा चुकी है के कारण वो रुझान अब तेजी से स्टार्टअप और बिजनेस की ओर बढ़ रहा है।लेकिन स्टार्टअप या बिजनेस के बारे में बात करना जितना आसान है उससे हजार गुना ज्यादा है उसे खड़ा करना और फिर कामयाब बनाना ।अब चूंकि एक कामयाब स्टार्टअप और बिजनेस के वैसे तो कई चरण है पर जो शुरुआती मुख्य चरण आता है वो है ,पैसा। क्योकि यह परम सत्य है कि पैसा ही पैसे को बनाता है और यही सबसे बड़ी समस्या है एक स्टार्टअप की इन्वेस्टमेंट कहाँ से आये।

स्टार्टअप में इन्वेस्टमेंट के जो शुरुआती तीन तरीके है जिन्हें शुरुआती स्टार्टअप तरीके है कहते है वे है FFF यानि Friends,Family,Fools ।इसमे स्टार्टअप शुरू करने वाला फ्रेंड से परिवार से पैसे लेकर इन्वेस्ट करता है या फिर तीसरा F ,Fool यानि किसी को अपने झांसे में लेकर अपने स्टार्टअप में इन्वेस्ट कराता है।

इसके बाद आते है एंजल इन्वेस्टर जो आपके स्टार्टअप में पैसा लगाता स्टार्टअप में थोड़ा हिस्सा लेता है और आपको समस्या से निकलता है। एंजल इन्वेस्टर जिस स्टेज में आता है वो होती है अर्ली स्टेज।

अब अर्ली स्टेज के बाद जो दो स्टेज आती है वे है ग्रोथ और मैच्योरिटी स्टेज,जिसमे क्रमशः वेंचर कैपिटलिस्ट(VC) और प्राइवेट एक्विविटी(PE) आते है।तो आज हम बात इन्ही दोनो की करेंगे।कि आखिर ये क्या है और इनमें अंतर क्या है।
VC असल मे वो होता है जो आपके आयडिया में पैसा लगाता है,वो देखता है कि आपके पास आइडिया है और आपको पैसे की जरूरत है तो VC आपके आयडिया में इन्वेस्ट करेगा।जबकि PE यानी प्राइवेट एक्विविटी आपकी ग्रोथ में पैसा लगाता है।मतलब यह तब आएगा जब उसे आपके स्टार्टअप में प्रॉफिट आता हुआ दिखेगा।मतलब ये की जब आपका स्टार्टअप बिजनेस की ओर बढ़ रहा होता है।
VC इन्वेस्टर हर धंधे में फोकस नही करता बल्कि सॉफ्टवेयर, टेक्नोलॉजी, बायो टेक में फोकस करता है पर PE इनवेस्टर हर तरह के क्षेत्र में फोकस करता है फिर चाहे आप मैन्युफैक्चरिंग में हो ,रिटेल में ,आईटी में ,बॉयोटेक ,टेक्नोलॉजी मतलब जहां उसे प्रॉफिट दिखता है अर्थात स्थिरता दिखती है।
VC चूंकि हाई रिस्क पर काम करता है तो वह इन्वेस्टमेंट ज्यादा से ज्यादा $1मिलियन से $5मिलियन तक ही करता है।परन्तु PE के साथ ऐसा नही क्योकि PE तो शुरुआत में बड़ी रकम लगाने को तैयार रहता है फिर चाहे वो $10 मिलियन हो या $100 मिलियन।
वही VC का मुख्य फोकस प्रॉफिट पर नही बल्कि आपकी सेल्स पर होता है। VC आपको कभी प्रॉफिट के लिए फोर्स नही करेगा बल्कि वह चाहेगा कि आपकी कम्पनी जल्दी से जल्दी ग्रोथ करे और बड़ा मार्किट शेयर तैयार करे।वही PE आपका ग्रोथ तो चाहता है पर वह पहले आपके प्रॉफिट चाहता है।क्योकि PE का फोकस केवल और केवल प्रॉफिट पर ही होता है।VC हमेशा मार्किट शेयर चाहता है,क्योकि VC का पैसा कई जगह लगा होता है।वह देखता है कि किनके पास क्या तकनीक और अच्छी लगी तो पैसा लगाता है।प्रॉफिट की कोई जल्दी नही क्योकि जब कम्पनी का मार्केट शेयर बड़ा होगा तो ऑटोमैटिक VC को इन्वेस्ट का फल मिलेगा। पर PE को कोई जल्दी नही है क्योकि उसने एक कम्पनी में भी पैसा बड़े फायदे के लिए लगाया होता है ,इसलिए उस्का फोकस होता है ,काम आराम से हो अच्छा हो।ताकि फायदा ही आये।
अब चूंकि VC को बड़ा मार्किट शेयर चाहिए इसलिए VC ने कई अलग अलग कम्पनियो मे पैसा लगाया होता है।मान लो VC ने 100 अलग अलग कम्पनियों में पैसा इनवेस्ट किया है तो 100 में से 10 भी बड़ा प्रॉफिट देती है तो वह बाकी 90 का नुकसान और आगे 200 में पैसे लगाने जितनी रकम तो कमा ही लेगी।जबकि PE आती ही आपकी ग्रोथ से है तो वो पैसा VC के मुकाबले बहुत ही कम मिलब अगर VC 100 पर पैसा लगा रही है तो PE 10-15 पर ही लगाएगी क्योकि वो एक एक कदम फूंक कर रखती है,क्योकि वो 10-15 में भी इतना पैसा इन्वेस्ट कर देती है जितना VC 100 में भी नही करती।क्योकि PE को चिंता है कि कही उसका पैसा ना डूब जाए,पर VC को ऐसी कोई ज्यादा चिंता नही होती।
वैसे तो दोनों का काम एक ही जैसा है दोनो ही प्रॉफिट चाहते है पर वेंचर कैपिटिलिस्ट यानी VC जहां शुरू में इन्वेस्ट करता है वही प्राइवेट एक्विविटी (PE) तब आता है जब आपका स्टार्टअप एक बढ़िया लय में चल रहा हो। मतलब VC आपके पास तब आता है जब आप बनना चाह रहा थे और PE तब जब आप बन चुके थे।
वही जब आप बन चुके होते है और आपको ज्यादा इन्वेस्टमेंट चाहिए तो प्राइवेट एक्विविटी के साथ ही आता है डेब्ट फाइनेंसिंग यानि कि बैंक से लोन ।तो अगर आपके बिजनेस में अब प्रॉफिट और स्थिरिता ज्यादा है तो प्राइवेट एक्विविटी की जगह बैंक से लोन सही रहेगा जहां आप थोड़ी सी देने योग्य ब्याज दर पर लोन ले पाएंगे,पर अगर आपको लगता है इन्वेस्टमेंट में अब भी रिस्क है ऐसे में प्राइवेट एक्विविटी ही बढ़िया ऑप्शन रहेगा।

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